गणेश जी की कथा
गणेश जी की कथा -
एक गाँव में सुरेश और उमेश दो कुबड़े साथ-साथ रहते थे। सुरेश बहुत धनी और उमेश बहुत गरीब था। दोनों में गहरी मित्रता थी तथा दोनों ही गणेशजी के परम भक्त थे। एक दिन उमेश ने सुरेश से कहा , " मैं तुम पर बोझ बनकर नहीं रहना चाहता हूँ। तब सुरेश ने कहा, " ऐसा करो तुम मेरे काम में हाथ बंटा दिया करो। " उमेश ने उसकी बात रखते हुए हर काम में सहयोग करना प्रारम्भ कर दिया।
धीरे धीरे सुरेश उमेश से बहुत अधिक काम लेने लग गया। वह अपमान भी करने लग गया, व्यवहार भी रुखा हो गया। एक दिन दुखी होकर उमेश वन में चला गया। उसने अपने आराध्य गणेश जी को याद किया।
गणेश जी पहले से ही उमेश की अवस्था से परिचित थे। वे एक यक्ष क रूप धरकर उमेश के समक्ष प्रकट हुए। उस पर दया कर उन्होंने उसे एक सोने के सिक्कों से भरी थैली दी और कहा , " यदि सदैव अच्छा आचरण करोगे तो तुमको इस थैली से हर आवश्यकता के समय सिक्के मिलते रहेंगे। " यह कहते हुए उसकी पीठ पर हाथ फेरा। इससे उसकी कूबड़ गायब हो गई।
जब उमेश घर गया तो उसने सारी बात सुरेश को भी बता दी। सुरेश के मन में लोभ जागा । वह भी जंगल में गया, गणेश जी को याद किया, यक्ष रूप में गणेश जी उसके सामने प्रकट हुए, गणेश जी उसके मन के लोभ को जानते थे, उन्होंने उसकी पीठ पर हाथ फेरा तो एक कूबड़ और हो गई, सिक्कों की थैली भी नहीं दी।
उमेश घबरा गया। उसने अपने किये के लिए क्षमा करने की प्रार्थना की। गणेश जी ने कहा, " तूने अपने मित्र का दिल दुखाया है, उसके साथ दुर्व्यवहार किया है, लोभ किया है, इसकी सजा तो भुगतनी ही होगी। परन्तु तू मेरा भकत है इसलिए यदि तू अपने किये पर सच्चे मन से सुरेश से क्षमा मांग ली तो तेरी कूबड़ ठीक हो जायेगी। " उमेश गणपति का आभार व्यक्त करते हुए शीघ्रता से घर गया। उसने मित्र से सच्चे मन से क्षमा प्रार्थना की। उसका कष्ट दूर हो गया।
हे गणेशजी जैसे तुमने सही आचरण करने वाले उमेश को दिया और सुरेश को क्षमा किया वैसे ही सबके साथ करना ।



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